
सिमरिया मेला काण्ड हरदोई(मिनी जलियाबाला काण्ड)
सेमरिया कांड:- उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में घटित ब्रिटिश हुकूमत की क्रूरता का एक ऐसा काला अध्याय है, जिसे 'उत्तर प्रदेश का मिनी जलियांवाला बाग हत्याकांड' कहा जाता है। यह ऐतिहासिक और दर्दनाक घटना 26 जनवरी 1932 को हरदोई के सवायजपुर (तत्कालीन सांडी) क्षेत्र के सेमरिया गांव में हुई थी, जहां स्वतंत्रता की अलख जगा रहे निहत्थे देशभक्तों पर अंग्रेजों ने अंधाधुंध गोलियां बरसाई थीं।घटना की पृष्ठभूमि (Background)भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा लाहौर अधिवेशन में पारित 'पूर्ण स्वराज' के प्रस्ताव के तहत, 26 जनवरी 1932 को पूरे देश में स्वतंत्रता की मांग की वर्षगांठ मनाई जा रही थी। इसी सिलसिले में हरदोई के क्रांतिकारियों ने भी जगह-जगह जुलूस और सभाएं आयोजित करने की योजना बनाई।मेले का अवसर: उन दिनों सेमरिया गांव में एक बहुत बड़ा वार्षिक पशु मेला लगा हुआ था, जिसमें दूर-दूर के क्षेत्रों से हजारों किसान और व्यापारी जुटे थे।
क्रांतिकारियों का आगमन: स्वतंत्रता सेनानी प0रामशंकर दुबे(लीडर), ठाकुर विशेश्वरसिंह लम्बरदार व महेश्वर नाथ शाहाबादी (गुप्त) के नेतृत्व में युवाओं और सत्याग्रहियों की एक टोली 'इंकलाब जिंदाबाद' और 'आजादी दो' के नारे लगाते हुए मेले में पहुंची। वहां पहले से ही स्थानीय नेता डोलमा सिंह के नेतृत्व में सैकड़ों देशभक्त मौजूद थे।बर्बर गोलीकांड की घटनामेला स्थल पर उमड़ी भीड़ और राष्ट्रवाद के नारों को देखकर ब्रिटिश प्रशासन बौखला गया।मजिस्ट्रेट का फरमान: मेला कंट्रोलर अंग्रेज मजिस्ट्रेट भगवत सहाय ने क्रांतिकारियों को तुरंत सभा रोकने और वहां से हट जाने का आदेश दिया।सत्याग्रहियों की जिद: देशभक्तों ने अंग्रेजों के इस दमनकारी आदेश को मानने से साफ इनकार कर दिया और शांतिपूर्ण ढंग से सभा जारी रखी।
अंधाधुंध फायरिंग:-बात बढ़ने पर मजिस्ट्रेट ने बिना किसी पूर्व चेतावनी के ब्रिटिश पुलिस और सिपाहियों को निहत्थी भीड़ पर सीधे गोलियां चलाने का हुक्म दे दिया। देखते ही देखते पूरा मेला मैदान निर्दोष नागरिकों और आजादी के दीवानों के खून से लाल हो गया।
भीषण शहादत और अंग्रेजों की क्रूरता:-लगभग 269 से 300 लोगों की शहादत: इस वीभत्स गोलीकांड में करीब 269 से 300 देशप्रेमी और आम नागरिक मौके पर ही शहीद हो गए।
साक्ष्यों को मिटाना: अपने इस भयानक जुर्म पर पर्दा डालने के लिए ब्रिटिश सरकार ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। उन्होंने शहीदों के शवों को रातों-रात पास में बह रही रामगंगा नदी में फेंकवा दिया।
फर्जी मुकदमे: इतने बड़े नरसंहार के बाद भी ब्रिटिश हुकूमत शांत नहीं हुई। उन्होंने उल्टा स्थानीय ग्रामीणों और आंदोलनकारियों पर दंगे का झूठा आरोप लगाया और 24 निरपराध लोगों पर मुकदमा चलाकर उन्हें कठोर कारावास की सजा दी।
वर्तमान स्थिति: सेमरिया शहीद स्थल दशकों तक इस घटना को इतिहास के पन्नों में वह स्थान नहीं मिला जो मिलना चाहिए था। बाद में, स्थानीय नागरिकों और समाजसेवी संगठनों ने आपसी सहयोग व चंदा जुटाकर सेमरिया गांव में एक भव्य शहीद स्मारक का निर्माण कराया।पंडित रामशंकर दुबे 'लीडर' जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की कर्मभूमि रहे इस जिले के इस बलिदान स्थल के बारे में अधिक विवरण आप Navbharat Times की रिपोर्ट में पढ़ सकते हैं। इसके अलावा, ETV Bharat पर भी इस शहीद स्थल की महत्ता का सजीव चित्रण उपलब्ध है। आज भी हर साल 26 जनवरी और राष्ट्रीय पर्वों पर यहाँ हजारों लोग आकर इन गुमनाम शहीदों को नमन करते हैं।
Krantikari pandit Ramshankar dubey leader ko shat shat naman
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