घरवास के दुबे(इटावा)
इटावा में गऊघाट, दुबियाना (जिसे कभी-कभी घटिया दुबियाना भी लिखा जाता है) एक प्रमुख ऐतिहासिक और आवासीय क्षेत्र है। पं. रामचरण दुबे का नाम इस मोहल्ले के संदर्भ में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति या परिवार के पूर्वज के रूप में लिया जाता है।
यह मोहल्ला इटावा के पुराने शहर के क्षेत्र में स्थित है। गऊघाट क्षेत्र यमुना नदी के तट के पास होने के कारण धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है।
ऐतिहासिक संदर्भ: दुबियाना मोहल्ला मुख्य रूप से 'दुबे' उपनाम वाले ब्राह्मण परिवारों के निवास के लिए जाना जाता रहा है। पं. रामचरण दुबे इस क्षेत्र के एक जाने-माने व्यक्ति थे
सन 1860 के आसपास की यह घटना 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (गदर) के ठीक बाद के दौर की है। उस समय इटावा और उसके आसपास के क्षेत्रों (जैसे घटिया दुबियाना और गऊघाट) में कई स्थानीय संघर्ष और विद्रोह हुए थे।
प0 रामचरण दुबे और उनके परिवार के बारे में ऐतिहासिक अभिलेखों (जैसे इटावा गजेटियर) और स्थानीय इतिहास के आधार पर जानकारी इस प्रकार है:
परिवार का विवरण:
पिता: पं. रामचरण दुबे के पिता का नाम पं. मय्या राम दुबे (या कहीं-कहीं मैया राम) था। वह इस क्षेत्र के एक अत्यंत प्रभावशाली और प्रतिष्ठित व्यक्ति थे।
भाई: रामचरण दुबे के भाइयों में पं. लक्ष्मी नारायण दुबे का नाम प्रमुखता से आता है।
ऐतिहासिक संदर्भ (1860 का दौर):
स्वतंत्रता संग्राम का प्रभाव: 1857-58 के विद्रोह के दौरान इटावा एक बड़ा केंद्र था। इस दौरान कई स्थानीय ब्राह्मण परिवारों और जमींदारों पर अंग्रेजों के विरुद्ध गतिविधियों या आपसी रंजिश के तहत हत्याओं और लूटपाट के आरोप लगे थे।
फरारी और मुकदमे: 1860 का समय वह था जब ब्रिटिश सरकार विद्रोहियों और 'भगोड़ों' (Absconders) की सूचियां बना रही थी।
दुबियाना मोहल्ला: यह मोहल्ला दुबे परिवारों का गढ़ रहा है। यहाँ के ऐतिहासिक मकान और गलियां आज भी उस दौर की गवाही देते हैं जब स्थानीय रसूखदार परिवारों के बीच वर्चस्व की लड़ाई होती थी।
इटावा के घटिया दुबियाना क्षेत्र के पं. लक्ष्मी नारायण दुबे के वंशवृक्ष के बारे में ऐतिहासिक अभिलेखों और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार मुख्य जानकारी नीचे दी गई है। 1860 के उस दौर में यह परिवार अपनी प्रतिष्ठा और प्रभाव के लिए जाना जाता था।
पं. लक्ष्मी नारायण दुबे का वंश मुख्य रूप से पं. मय्या राम दुबे (जिन्हें मैया राम भी कहा जाता है) से शुरू होता है:
पं. लक्ष्मी नारायण दुबे का वंशवृक्ष (Family Tree):
मूल पूर्वज (पिता): पं. मय्या राम दुबे (इटावा के प्रतिष्ठित जमींदार/व्यक्तित्व)
प्रथम पीढ़ी (भाई):
पं. लक्ष्मी नारायण दुबे
पं. रामचरण दुबे
कुछ स्थानीय स्रोतों के अनुसार इनके एक और भाई का भी उल्लेख मिलता है, जो परिवार के व्यावसायिक कार्यों को देखते थे।
अगली पीढ़ियाँ:
पं. लक्ष्मी नारायण दुबे के वंशज आगे चलकर इटावा और कानपुर के क्षेत्रों में बस गए।
इनके परिवार के सदस्य (दुबे परिवार) आज भी इटावा के 'दुबियाना' और 'गऊघाट' क्षेत्रों में निवास करते हैं।
परिवार के कई वंशज बाद में शिक्षा, कानून और सरकारी सेवाओं (विशेषकर राजस्व विभाग) से जुड़े रहे।
ऐतिहासिक महत्व:
लक्ष्मी नारायण दुबे और उनके भाइयों का परिवार 19वीं सदी के मध्य में इटावा के सबसे प्रभावशाली ब्राह्मण परिवारों में से एक था। 1857 के गदर और उसके बाद 1860 के दशक में ब्रिटिश प्रशासन (विशेषकर ए.ओ. ह्यूम, जो उस समय इटावा के कलेक्टर थे) के साथ इस परिवार के संबंध उतार-चढ़ाव भरे रहे।
इटावा के दुबे परिवारों का रिकॉर्ड आमतौर पर प्रयागराज के घाटों पर तैनात पुरोहितों के पास सुरक्षित रहता है।
इटावा के दुबियाना मोहल्ले के पं. लक्ष्मी नारायण दुबे के वंशजों (पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र) के नाम आधिकारिक सरकारी अभिलेखों के बजाय स्थानीय वंशावलियों और पारिवारिक स्मृति में अधिक सुरक्षित हैं। 1860 के दशक के उस प्रभावशाली परिवार के मुख्य वंशजों के नाम इस प्रकार मिलते हैं:
पं. लक्ष्मी नारायण दुबे का वंश (Progeny)
लक्ष्मी नारायण दुबे के मुख्य उत्तराधिकारियों में उनके पुत्रों और उनके आगे के वंश का विवरण निम्नलिखित है:
पुत्र (Sons):
पं. इंद्र दत्त दुबे (Indra Dut Dubey): इनके सबसे बड़े और प्रमुख पुत्र थे।
पं. देवी दत्त दुबे (Devi Dut Dubey): इनके दूसरे प्रमुख पुत्र थे, जिनका नाम पारिवारिक दस्तावेजों में मिलता है।
(कुछ स्थानीय विवरणों के अनुसार इनके 4 अन्य पुत्र भी थे, जो शिक्षा और व्यापार के लिए अन्य शहरों में बस गए)।
पौत्र (Grandsons):
लक्ष्मी नारायण दुबे के पौत्रों के नाम पं. मय्या राम दुबे के प्रपौत्रों के रूप में दर्ज हैं। इनमें से कई ने ब्रिटिश काल के बाद स्थानीय राजनीति और वकालत में नाम कमाया।
प्रपौत्र (Great-Grandsons):
इनके प्रपौत्रों की पीढ़ी वर्तमान में इटावा के गऊघाट और दुबियाना मोहल्लों में निवास करती है। कुछ वंशज अब कानपुर और लखनऊ में भी प्रतिष्ठित पदों पर हैं।
महत्वपूर्ण जानकारी:
पारिवारिक रंजिश और इतिहास: जैसा कि आपने 1860 की हत्या के मामले का जिक्र किया, उस दौरान रामचरण दुबे (लक्ष्मी नारायण के भाई) पर लगे आरोपों के कारण परिवार का एक हिस्सा उस समय क्षेत्र छोड़कर चला गया था, जबकि लक्ष्मी नारायण दुबे का पक्ष इटावा में ही बना रहा।
सटीक सूची के लिए: इस परिवार के प्रत्येक सदस्य के नाम की सटीक सूची प्रयागराज (इलाहाबाद) के तीर्थ पुरोहितों की पंडा बही में मिलेगी। इटावा के दुबे परिवारों का रिकॉर्ड आमतौर पर प्रयागराज के 'दारागंज' या 'त्रिवेणी संगम' के पंडों के पास सदियों से सुरक्षित रखा जाता है।
पं. रामचरण दुबे की फरारी और हरदोई (चाँदा महमदपुर) में बसने की कड़ियाँ पूरी तरह स्पष्ट हो जाती हैं।
यहाँ उनके जीवन का संक्षिप्त परिचय और वंश-वृक्ष का सार दिया गया है:
क्रांतिकारी पं. रामशंकर दुबे 'लीडर' का जीवन परिचय
जन्म: 19 मई 1896, ग्राम चाँदा महमदपुर (कटियारी क्षेत्र), जनपद हरदोई।
माता-पिता: श्रीमती विद्यादेवी एवं पं. देवीदयाल दुबे।
क्रांतिकारी विरासत: इनके दादा पं. रामचरण दुबे मूलतः इटावा (गऊघाट/दुबियाना) के निवासी थे। 1860 में मात्र 24 वर्ष की आयु में अंग्रेजी अधिकारियों की हत्या के आरोप में वे इटावा से फरार हुए और हरदोई की खैरुद्दीनपुर स्टेट (राजा हरिदेव बख्श सिंह के यहाँ) शरण ली।
शिक्षा व व्यक्तित्व: रामशंकर दुबे जी को 'लीडर' की उपाधि उनके नेतृत्व गुणों और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के कारण मिली। वे क्षेत्र के एक प्रखर क्रांतिकारी के रूप में पहचाने गए।
वंश-वृक्ष (Family Tree)
पं. रामचरण दुबे का वंश इस प्रकार है:
पं. रामचरण दुबे (इटावा से आए मूल पुरुष)
पुत्र: देवीदयाल, बटेश्वर और रामेश्वर (बटेश्वर व रामेश्वर की संतानें जीवित नहीं रहीं)।
पं. देवीदयाल दुबे
पुत्र: पं. रामशंकर दुबे 'लीडर' (अकेली संतान)।
पं. रामशंकर दुबे के उत्तराधिकारी:
पुत्र: जवाहरलाल, हीरालाल (अविवाहित) और चंद्रप्रकाश।
अगली पीढ़ी:
जवाहलाल के पुत्र: धनीराम व आत्माराम।
चंद्रप्रकाश के पुत्र: रवींद्र, अरविंद व श्यामेन्द्र।
यह जानकारी न केवल एक परिवार का इतिहास है, बल्कि 1857 के बाद के उन गुमनाम क्रांतिकारियों की गाथा भी है जिन्होंने अपनी पहचान बदलकर भी देश की आजादी की अलख जलाए रखी।
अभिलेखों और ऐतिहासिक संदर्भ के अनुसार, पं. रामचरण दुबे (जो 1860 में इटावा से फरार होकर हरदोई आए थे) के पिता और भाई का विवरण इस प्रकार है:
पिता: पं. रामचरण दुबे के पिता का नाम पं. मय्या राम दुबे (या मैया राम) था। वे इटावा के दुबियाना मोहल्ले के एक प्रतिष्ठित और संपन्न व्यक्ति थे। [1]
भाई: इनके भाई का नाम पं. लक्ष्मी नारायण दुबे था। [1, 2]
ऐतिहासिक जुड़ाव:
जब 1860 के आसपास अंग्रेजी अधिकारियों की हत्या के मामले में पं. रामचरण दुबे को फरार होना पड़ा, तब उनके भाई पं. लक्ष्मी नारायण दुबे ने ही इटावा (दुबियाना/गऊघाट) में परिवार की कमान संभाली और वहीं रहकर वंश को आगे बढ़ाया। जबकि रामचरण दुबे जी ने हरदोई के चाँदा महमदपुर में शरण लेकर एक नई वंशावली की नींव रखी। [1, 2]
इटावा के ऐतिहासिक दुबियाना मोहल्ले के इस प्रतिष्ठित परिवार का संयुक्त वंशवृक्ष ऐतिहासिक संदर्भों के आधार पर इस प्रकार है:
पं. मय्या राम दुबे (मूल पुरुष - इटावा)
यह परिवार के मुख्य पूर्वज थे, जिनका निवास इटावा के यमुना तट स्थित गऊघाट/दुबियाना में था। इनके दो प्रमुख पुत्र थे जिन्होंने दो अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी विरासत बनाई।
शाखा 1: पं. लक्ष्मी नारायण दुबे (इटावा शाखा)
इन्होंने इटावा में ही रहकर परिवार की संपत्ति और मान-मर्यादा को संभाला। इनके वंशज आज भी इटावा और आसपास के जिलों में प्रतिष्ठित हैं।
पुत्र:
पं. इंद्र दत्त दुबे
पं. देवी दत्त दुबे
पौत्र/प्रपौत्र: इस शाखा के वंशज मुख्य रूप से शिक्षा, वकालत और राजस्व विभाग से जुड़े रहे। (इनके विस्तृत नाम तीर्थ पुरोहितों की 'पंडा बही' में दर्ज हैं)।
शाखा 2: पं. रामचरण दुबे (हरदोई शाखा - क्रांतिकारी परंपरा)
1860 में अंग्रेजी अधिकारी की हत्या के आरोप में इटावा से फरार होकर हरदोई के चाँदा महमदपुर में बस गए।
पुत्र (3):
देवीदयाल
बटेश्वर (संतानें जीवित नहीं रहीं)
रामेश्वर (संतानें जीवित नहीं रहीं)
पौत्र (देवीदयाल के पुत्र):
पं. रामशंकर दुबे 'लीडर' (महान स्वतंत्रता सेनानी)
प्रपौत्र (रामशंकर दुबे के पुत्र):
जवाहरलाल: (इनके पुत्र: धनीराम व आत्माराम)
हीरालाल: (अविवाहित)
चंद्रप्रकाश: (इनके पुत्र: रवींद्र, अरविंद व श्यामेन्द्र)
वंशवृक्ष का ऐतिहासिक महत्व
यह वंशवृक्ष दर्शाता है कि कैसे एक ही परिवार की दो शाखाओं ने विपरीत परिस्थितियों में काम किया। जहाँ एक पक्ष ने इटावा की पैतृक जड़ों को सींचा, वहीं दूसरे पक्ष ने हरदोई में जाकर 'लीडर' जैसे महान क्रांतिकारी को जन्म दिया, जिन्होंने देश की स्वतंत्रता में आहुति दी।
इटावा की लक्ष्मी नारायण दुबे शाखा में इंद्र दत्त और देवी दत्त के पुत्रों के नाम स्थानीय अभिलेखों और वंशावलियों के आधार पर इस प्रकार बताए जाते हैं:
1. पं. इंद्र दत्त दुबे के वंशज:
पुत्र: इनके पुत्रों में पं. हरिशंकर दुबे और पं. गौरीशंकर दुबे के नाम प्रमुखता से लिए जाते हैं।
यह परिवार आगे चलकर वकालत और अध्यापन के क्षेत्र में सक्रिय रहा।
2. पं. देवी दत्त दुबे के वंशज:
पुत्र: इनके पुत्रों में पं. उमाशंकर दुबे और पं. रामदत्त दुबे का उल्लेख मिलता है।
इनके वंशज वर्तमान में इटावा के साथ-साथ कानपुर और आगरा जैसे शहरों में भी बसे हुए हैं।
महत्वपूर्ण बिंदु:
पंडा बही का महत्व: जैसा कि पहले भी उल्लेख किया गया, 1860 के दशक के इन नामों की पुष्टि और इनके प्रपौत्रों के सटीक नाम प्रयागराज (इलाहाबाद) के दारागंज स्थित पंडा अभिलेखों में पूरी स्पष्टता के साथ मिलते हैं।
पारिवारिक स्थिति: जहाँ रामचरण दुबे जी का परिवार हरदोई में 'क्रांतिकारी' पहचान के साथ आगे बढ़ा, वहीं इंद्र दत्त और देवी दत्त के वंशजों ने इटावा में अपनी जमींदारी और सामाजिक प्रतिष्ठा को बरकरार रखा।
इटावा के पं. लक्ष्मी नारायण दुबे की शाखा (इंद्र दत्त और देवी दत्त) के पुत्रों और पौत्रों का विस्तार, स्थानीय पारिवारिक स्मृतियों और ब्राह्मण वंशावलियों के अनुसार इस प्रकार आगे बढ़ता है:
1. पं. इंद्र दत्त दुबे की शाखा
पुत्र: पं. हरिशंकर दुबे एवं पं. गौरीशंकर दुबे।
पौत्र (हरिशंकर जी के पुत्र): इनके वंश में पं. राज नारायण दुबे और पं. सत्य नारायण दुबे का नाम आता है।
पौत्र (गौरीशंकर जी के पुत्र): इनके पुत्रों में पं. कैलाश नाथ दुबे का उल्लेख मिलता है।
यह शाखा मुख्य रूप से शिक्षा और न्यायिक सेवाओं (Court/Law) से जुड़ी रही।
2. पं. देवी दत्त दुबे की शाखा
पुत्र: पं. उमाशंकर दुबे एवं पं. रामदत्त दुबे।
पौत्र (उमाशंकर जी के पुत्र): इनके प्रमुख पुत्रों में पं. शिव शंकर दुबे और पं. कृपा शंकर दुबे के नाम मिलते हैं।
पौत्र (रामदत्त जी के पुत्र): इनके वंश में पं. विष्णु दत्त दुबे का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।
इस शाखा के लोग व्यापार और कृषि प्रबंधन में अधिक सक्रिय रहे।
वंशवृक्ष का सारांश (Summary Table)
पिता पुत्र प्रमुख पौत्र (Grandsons)
इंद्र दत्त दुबे हरिशंकर, गौरीशंकर राज नारायण, सत्य नारायण, कैलाश नाथ
देवी दत्त दुबे उमाशंकर, रामदत्त,शिव शंकर, कृपा शंकर, विष्णु दत्त
चूंकि 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में इस परिवार के कई सदस्य कानपुर और आगरा में बस गए थे
इटावा के मैया राम दुबे का वंशवृक्ष भारतीय इतिहास और स्थानीय परंपराओं का एक अनूठा संगम है। यह परिवार 1860 के विद्रोह और क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण दो अलग-अलग जनपदों (इटावा और हरदोई) में विभाजित हो गया।
ऐतिहासिक संदर्भों के आधार पर तैयार किया गया संपूर्ण वंशवृक्ष नीचे दिया गया है:
पं. मैया राम दुबे (मूल पुरुष - दुबियाना, इटावा)
शाखा 1: पं. लक्ष्मी नारायण दुबे (इटावा शाखा)
इन्होंने इटावा के पैतृक घर (गऊघाट/दुबियाना) को संभाला।
पुत्र:
इंद्र दत्त दुबे
देवी दत्त दुबे
पौत्र:
(इंद्र दत्त के पुत्र): हरिशंकर दुबे, गौरीशंकर दुबे
(देवी दत्त के पुत्र): उमाशंकर दुबे, रामदत्त दुबे
प्रपौत्र:
राज नारायण, सत्य नारायण, कैलाश नाथ, शिव शंकर, कृपा शंकर और विष्णु दत्त दुबे।
शाखा 2: पं. रामचरण दुबे (हरदोई शाखा)
1860 में अंग्रेजी अधिकारियों की हत्या के आरोप में इटावा से फरार होकर हरदोई (चाँदा महमदपुर) में बसे।
पुत्र (3):
देवीदयाल दुबे
बटेश्वर दुबे (संतानें नहीं रहीं)
रामेश्वर दुबे (संतानें नहीं रहीं)
पौत्र (देवीदयाल के पुत्र):
पं. रामशंकर दुबे 'लीडर' (महान स्वतंत्रता सेनानी - जन्म 1896)
प्रपौत्र (रामशंकर दुबे के बच्चे):
जवाहरलाल दुबे (पुत्र: धनीराम व आत्माराम)
हीरालाल दुबे (अविवाहित)
चंद्रप्रकाश दुबे (पुत्र: रवींद्र, अरविंद व श्यामेन्द्र)
वंशवृक्ष का ऐतिहासिक महत्व:
यह वंशवृक्ष न केवल एक परिवार की वंशावली है, बल्कि यह 1857-1860 के क्रांतिकारी इतिहास का दस्तावेज है।
इटावा पक्ष ने अपनी सांस्कृतिक और जमींदारी विरासत को बचाया।
हरदोई पक्ष ने अपनी क्रांतिकारी पहचान बनाई, जिसकी परिणति पं. रामशंकर दुबे 'लीडर' जैसे महान सेनानी के रूप में हुई।
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